Raksha Bandhan 2026: झारखंड में जंगलों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर ग्रामीण हमेशा से ही बेहद सजग रहे हैं। पेड़ों के प्रति अपने इसी गहरे जुड़ाव को एक बार फिर से दर्शाते हुए राज्य के विभिन्न गांवों के लोग इस बार एक लाख पेड़ों पर राखी बांधेंगे। प्रकृति के प्रति इस अनूठी पहल और जन-जागरूकता के चलते राज्य के वन क्षेत्रों में लगातार सकारात्मक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
झारखंड में मनुष्य और प्रकृति के बीच भावनात्मक रिश्ते को और मजबूत करने के लिए, शुक्रवार को Raksha Bandhan 2026 के पावन पर्व पर ग्रामीण करीब एक लाख पेड़ों पर राखी बांधेंगे। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) संजीव कुमार ने जानकारी दी है कि यह अनूठी पहल एक महीने तक चलने वाले ‘पेड़ बचाओ’ अभियान का एक प्रमुख हिस्सा है। इस व्यापक अभियान के तहत राज्य के 24 जिलों के चुनिंदा गांवों में कुल तीन लाख पेड़ों पर राखी बांधने का बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
पेड़ों को राखी बांधकर पर्यावरण की रक्षा का संकल्प
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) संजीव कुमार शुक्रवार को गुमला जिले के जोराड़ गांव में एक पेड़ पर राखी बांधकर इस विशेष अभियान का औपचारिक शुभारंभ करेंगे। उन्होंने कहा कि Raksha Bandhan 2026 मुख्य रूप से भाई-बहन का पर्व है, जिस दिन भाई अपनी बहनों की सुरक्षा का प्रण लेते हैं; ठीक उसी प्रकार पर्यावरण की रक्षा करना भी हमारा परम कर्तव्य है, क्योंकि हमारा अस्तित्व इसी पर टिका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रकृति के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ना है, जिसके तहत ग्रामीण पेड़ों को राखी बांधकर उनकी जीवनभर रक्षा करने का संकल्प लेते हैं।
700 गांवों में पेड़ों को राखी बांधने का अनूठा कार्यक्रम
पीसीसीएफ ने जानकारी दी है कि शुक्रवार को रक्षाबंधन के अवसर पर राज्य के 700 गांवों में लगभग एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य तय किया गया है। एक महीने तक चलने वाले इस व्यापक अभियान के तहत झारखंड के 24 जिलों में कुल तीन लाख पेड़ों पर राखी बांधी जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि पर्यावरण संरक्षण की इस बेहतरीन पहल की शुरुआत साल 2004 में धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड स्थित लुकैया गांव से हुई थी, जो उस समय माओवाद (नक्सल) प्रभावित क्षेत्र माना जाता था।
12,000 से अधिक गांवों तक फैला अभियान
पीसीसीएफ ने जानकारी दी कि शुरुआत से लेकर अब तक इस अनूठी पहल से राज्यभर के 12,000 से अधिक गांवों को जोड़ा जा चुका है। उन्होंने बताया कि इस अभियान के जरिए अकेले लुकैया गांव में 20,000 से ज्यादा महुआ के पेड़ों का संरक्षण किया गया है, जो आज ग्रामीणों की आजीविका का एक मजबूत जरिया बन चुके हैं। यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं है, बल्कि इस मुहिम ने कई गांवों में लघु वनोपज (Minor Forest Produce) के उत्पादन को बढ़ाकर लोगों की आमदनी में भी इजाफा किया है। साथ ही, इस पहल ने झारखंड के हरित आवरण (Forest Cover) को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई है।

झारखंड के वनों में लगातार इजाफा
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से झारखंड के वन क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी दर्ज हो रही है। वन विभाग के इन सार्थक प्रयासों का असर आधिकारिक रिपोर्टों में भी साफ झलकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2001 से लेकर पिछले दो दशकों में राज्य के वन क्षेत्र में 1,128 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। FSI 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड का कुल वन क्षेत्र 23,765.78 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 29.76 प्रतिशत है। यह आँकड़ा साल 2001 के FSI में दर्ज 22,637 वर्ग किलोमीटर की तुलना में काफी अधिक है।
वनों के पुनर्जीवन और जल संरक्षण में अहम भूमिका
रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड के कुल वन क्षेत्र में 2,635.35 वर्ग किलोमीटर अत्यंत घना वन (Very Dense Forest), 9,640.99 वर्ग किलोमीटर मध्यम घना वन (Moderately Dense Forest) और 11,489.44 वर्ग किलोमीटर खुला वन क्षेत्र (Open Forest) शामिल है। पीसीसीएफ संजीव कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि इस अनूठे अभियान ने जल संरक्षण और बड़े पैमाने पर जंगलों के पुनर्जीवन (Regeneration) में भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
संजीव कुमार ने आगे कहा कि यदि जंगलों को बचाया जाए, तो इससे बेहतर बारिश होगी और पर्याप्त पानी मिलने से कृषि कार्यों को बढ़ावा मिलेगा। वन क्षेत्र जैव विविधता (Biodiversity) को भी समृद्ध करते हैं, जो खेती-किसानी के लिए बेहद फायदेमंद है। वहीं, इस महीने आयोजित 77वें ‘वन महोत्सव’ के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी यह बात दोहराई थी कि पर्यावरण की रक्षा करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को कड़े निर्देश दिए थे कि विभाग केवल पौधे लगाने तक ही सीमित न रहे, बल्कि नए पौधों में खाद डालने, उनकी देखरेख करने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष अभियान भी चलाए।